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किताब रिव्यु : मौन मुस्कान की मार – Ashutosh Rana

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Maun Muskan Ki Mar Book

आशुतोष राणा (Ashutosh Rana) जी के बहुआयामी व्यक्तित्व से कौन परिचित नहीं। अभिनय के क्षेत्र में वह जितने अच्छे कलाकार हैं उतने ही उम्दा लेखक भी हैं। उनकी पुस्तक ‘मौन मुस्कान की मार’ (Maun Muskan Ki Mar)जीवन दर्शन का एक व्यापक आसमान समेटे है। इसमें सम्मिलित सत्ताइस व्यंग्य रचनाओं पर बहुत कुछ पहले ही कहा जा चुका है। इसमें कोई शक नहीं है कि विविध विषयों पर आधारित यह सब रचनाएँ एक से बढ़कर एक हैं ,बेजोड़ हैं, और बेहद सशक्त भी।

व्यंग से भरपूर है Ashutosh Rana की किताब “Maun Muskan Ki Mar”

मुझे इस किताब “Maun Muskan Ki Mar” में जिस बात ने सबसे ज़्यादा आकर्षित किया वह है व्यंग्य के ज़रिए दी जानेवाली सीख, वरना ज़्यादातर व्यंग्य रचनाओं में समस्या का बखान या बखिया उधेड़ना तो होता है पर उन समस्याओं का समाधान क्या होना चाहिए , ऐसा कुछ भी पढ़ने, समझने को नहीं मिलता । आशुतोष जी (Ashutosh Rana) की रचनाओं में सबसे खूबसूरत यही बात है । जीवन दर्शन पर लिखे उनके अनेक लेखों के जरिए हम पहले ही यह जानते हैं की विभिन्न विषयों पर उनकी कितनी गहरी पकड़ है ।

sushma gupta reading

Dr. Sushma Gupta reading book “Maun Muskan Ki Mar”.

“Maun Muskan Ki Mar” किताब शुरू होती है , कन्वे की कॉफी से। आशुतोष सर (Ashutosh Rana) का बात कहने का अंदाज़ ‘अपनी बात’ कहने के लिए भी निराला ही है। बचपन का प्रसंग कन्वे की कॉफी वाला जिसको उन्होंने इस पुस्तक का आधार बताया है , अपने आप में एक बहुत बड़ी शिक्षा देता है । व्यंग्य विधा एक बहुत ही कठिन विधा है जिसमें आशुतोष सर (Ashutosh Rana) को महारत हासिल है।

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अभिनेता के साथ साथ कवि भी है Ashutosh Rana

हँसी-हँसी में बात कह जाना और ऐसे कह जाना जो दिल-दिमाग पर गहरी छाप छोड़ दे, यह आशुतोष जी (Ashutosh Rana) की खासियत है। मैं यहाँ पर उनकी हर रचना में से अपनी पसंद की कुछ पंक्तियाँ हाईलाइट कर रही हूँ।

Actor Ashutosh Rana

किताब “मौन मुस्कान की मार” के लेखक फिल्म अभिनेता “आशुतोष राणा” (Ashutosh Rana) अपने लैपटॉप पर काम करते हुए.

उनकी (Ashutosh Rana) पहली रचना “लामचंद्र की लाल बत्ती” (Lamchandra Ki Lal Batti) , जिसका मुख्य किरदार जीवन भर लाल बत्ती वाली गाड़ी की लालसा में लगा रहता है और न मिल पाने पर अपना मानसिक संतुलन ही खोने के कगार पर पँहुचने लगता है । यह रचना जीवन में लगभग भूला ही दिए गए एक बड़े सच की तरफ हमारा ध्यान खींचती है ।

कई रचनायें लिखी है अभिनेता “Ashutosh Rana” ने

“सफलता पूर्वक जीवन जीने के लिए जितना महत्व संकल्प का होता है, शांतिपूर्ण जीवन जीने के लिए उतना ही महत्व विकल्प का भी होता है। विकल्प जहाँ जीवन में शांति की सृष्टि करते हैं वही संकल्प कभी-कभी अशांति का कारक होता है।”  उनकी दूसरी रचना ‘गप्पी और पप्पी’ (Gappi Or Pappi) ध्यान आकर्षित करती है , आज के समाज में फैली हुई उस दिखावे की देवी की ओर जो वर्तमान में सबसे ज़्यादा पूजनीय है । परंपरा , धर्म , मुल्य सब को कटघरे में खड़ा कर

नोट : आप इस किताब “Maun Muskan Ki Mar” को भारत के सबसे बड़े ऑनलाइन स्टोर “अमेज़न” से खरीद सकते हैं या फिर आप ऑनलाइन ईबुक में भी पढ़ सकते है.

बुक खरीदने का लिंक : मौन मुस्कान की मार

ई बुक लिंक : मौन मुस्कान की मार

 

रिव्यु लेखक : डॉ सुषमा गुप्ता

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सेल्फी ने भारतीयों को बीमार बना दिया ! पढ़े प्रियंका की खास रिपोर्ट

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सेल्फी !! ये आज के समय में युवाओं के बीच प्रचलित सबसे महत्वपूर्ण शब्द बन गया है और ये महज़ एक शब्द नहीं बल्कि युवाओं में अपने बेहतरीन पलों को कैमरे में कैद करने का सबसे बेहतरीन तरीका भी माना जाने लगा है लेकिन आज यही सेल्फी जानलेवा साबित होने लगी है ।

सेल्फी से जुड़ी कई दुखद घटनाये जब हमारे सामने आती है तो मन एक बार जरूर विचलित हो उठता है । बीते दिनों यूपी के कानपुर में गंगा बैराज में कुछ छात्र मौज-मस्ती के लिए गए थे।

सेल्फी का शौक और उसका क्रेज उनकी जिंदगी पर इस कदर भारी पड़ा कि इस चक्कर में सात लोगों की डूबकर मौत हो गई।

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि सेल्फी के चक्कर में कभी-कभी हमें इसका खामियाजा अपनी जान देकर उठाना पड़ता है।

selfie

सेल्फी का क्रेज दरअसल एक जानलेवा एडवेंचर साबित हो रहा है जहां मौज-मस्ती की चाह और कुछ नया कर गुजरने ख्वाहिश रखनेवाले (ज्यादातर युवाओं) को जान से हाथ धोना पड़ता है या अन्य दुर्घटना का शिकार होना पड़ता है। यह अजीब विडंबना है कि महज एक सेल्फी का क्रेज युवाओं की जिंदगी को निगल रहा है।

अब सेल्फी स्टिक के जरिए युवा इस लेकर ज्यादा क्रेजी हो उठे है। सेल्फी से जुड़ा एक्सपेरिमेंट दरअसल जानलेवा साबित हो रहा है लेकिन ज्यादातर युवा इसे नजरअंदाज कर रहे है जिससे भयावह स्वरूप हम सामने देख रहे है, जो चिंतित करनेवाला है।

सेल्फी स्मार्टफोन की तकनीक की देन है जिसमें उसमें लगे कैमरा की अहम भूमिका होती है। अगर स्मार्टफोन है तभी सेल्फी ली जा सकती है। भारत की आबादी 125 करोड़ को पार कर चुकी है लेकिन देश में मोबाइल की संख्या उसका पीछा करती हुई दिख रही है। देश में इस वक्त कुल 105.92 करोड़ मोबाइल यूजर्स है।

ऐसा लगता है कि कुछ साल में देश की आबादी से ज्यादा मोबाइल यूजर्स की संख्या हो जाएगी। क्योंकि ज्यादातर लोग एक से ज्यादा मोबाइल रखने लगे हैं। देश में 103.42 करोड़ वाई-फाई उपभोक्ता है जो वाई-फाई नेटवर्क का इस्तेमाल करते है। लगभग 16 करोड़ लोग ब्रॉडबैंड के जरिए इंटरनेट का प्रयोग करते है। यह कुछ आंकड़े है जिनसे यह पता चलता है कि देश में मोबाइल,स्मार्टफोन और इंटरनेट का इस्तेमाल दिन-ब-दिन तेजी से बढ़ता चला जा रहा है।

94 मिलियन सेल्फी प्रतिदिन दुनिया में क्लिक होते हैं। सेल्फी यानी खुद की फोटो खींचना। भारत ही नहीं पूरे देश में इसके प्रति लोगों की दीवानगी बढ़ी है लेकिन युवाओं में इसका क्रेज सर चढ़कर बोलता है। युवाओं के अलावा शायद ही कोई ऐसा वर्ग होगा जो इसके क्रेज से अछूता हो। देखा जाए तो इसका चलन पिछले तीन से चार साल में ज्यादा बढ़ा है।

स्मार्टफोन कल्चर के दौर में इसे सबसे ज्यादा बढ़ावा मिला। क्योंकि सेल्फी लेना फ्रंट कैमरे से मुमकिन होता है। गूगल के सर्वे से पता चलता है कि स्मार्टफोन के इस दौर में आज के युवक-युवतियां जो पूरे दिन में रोजाना औसतन 11 घंटे अपने फोन पर बिताते हैं वे पूरे दिन में एक-दो नहीं बल्कि 20-25 सेल्फी लेते हैं।

सेल्फी का क्रेज कितना जानलेवा साबित हो रहा है, यह हम देख रहे है। लेकिन लोगों की स्मार्टफोन से बढ़ती अनावश्यक आसक्ति चिंतित करनेवाली है। एक सर्वे के मुताबिक पुरुष 20 सेकेंड से ज्यादा समय तक भी अपने मोबाइल फोन या स्मार्टफोन से दूर नहीं रह पाते। दूसरी तरफ महिलाओं की स्थिति इस मामले में पुरुषों से थोड़ी बेहतर है। महिलाएं अपने करीब से मोबाइल की दूरी 57 सेकेंड से ज्यादा बर्दाश्त नहीं कर पाती है। मतलब साफ है कि पुरुषों को अगर 20 सेकेंड और महिलाओं को 57 सेकेंड में मोबाइल की गैर-मौजूदगी उन्हें बैचन करती है।

दूसरी तरफ भारत अब भी ‘सेल्फी डेथ कंट्री’ में शुमार होता है जहां रिपोर्ट के मुताबिक सेल्फी के दौरान सबसे ज्यादा मौतें होती है। ‘द वाशिंगटन पोस्ट’ ने चंद महीने पहले अपनी एक रिपोर्ट में यह दावा किया था कि साल 2015 में भारत में कई लोगों ने खतरनाक तरीके से सेल्फी लेने की कोशिश की। इस वजह से उनकी जान चली गई। दुनियाभर में सेल्फी के चक्कर में 27 लोगों की जान गई जिनमें 15 से ज्यादा मौतें सिर्फ भारत में हुईं। यह आंकड़ा चिंतित करनेवाला है।

ज्यादातर ये देखा गया है कि लोग या फिर युवा खतरनाक जगहों पर और खतरनाक स्थिति में सेल्फी के दीवाने होते है। एक ऐसी स्थिति जिस जगह सेल्फी की चाहत एक दुर्घटना को जन्म देती है और यह मौत का भी कारण बन सकती है। युवाओं को इस तरह की सेल्फी लेने और फिर उसे व्हाट्सएप पर भेजने या सोशल साइट पर अपलोड करने की जल्दी होती है।

यही जल्दी एक लापरवाही में तब्दील होती है जिससे लोग अपनी जिंदगी की अपने हाथों बलि दे रहे हैं। जनवरी 2016 में सेल्फी लेने के चक्कर में मुंबई में पुलिस ने 16 पिकनिक स्पॉट को ‘नो सेल्‍फी जोन्स’ जोन बनाया। मकसद यही था कि फिर सेल्फी के चक्कर में किसी की जिंदगी नहीं जाए।

 

इन्हीं सब चीजों को ध्यान में रखते हुए पिछले साल नासिक कुंभ मेले के दौरान कुछ जगहों पर भी ‘नो सेल्फी जोन्स’ बनाए गए थे। पिकनिक स्पॉट, समंदर की लहरों, ऊंची चट्टानों, नदी की जलधारा युवाओं को सेल्फी लेने के लिए आकर्षित करती है और यही दीवानगी जानलेवा साबित हो रही है।

सेल्फी का शौक अपनी गलती और लापरवाही से एक तरफ जानलेवा साबित हो रहा है तो दूसरी तरफ स्मार्टफोन के इस्तेमाल के और भी कई नुकसान है जिसका सीधा संबंध हमारे सेहत से है। त्वचा विशेषज्ञों के मुताबिक चेहरे पर लगातार स्मार्टफोन की लाइट और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन से त्वचा को नुकसान पहुंच सकता है। इससे चेहरे की झुर्रियां भी बढ़ सकती हैं। शोध में यह भी पाया गया है कि व्यक्ति जिस साइड से स्मार्टफोन यूज करता है उसका वह हिस्सा दूसरे हिस्से की बजाय ज्यादा प्रभावित होता है।

जानकारों के मुताबिक फोन की स्क्रीन की नीली रोशनी भी त्वचा को नुकसान पहुंचा सकती है। रोशनी का मैगनेटिक प्रभाव होता है जो त्वचा पर असर डालने के साथ चेहरे के रंग को भी प्रभावित करता है। कुछ विशेषज्ञों यह भी मानना है कि मोबाइल फोन की विद्युतचुंबकीय तरंगें डीएनए को नुकसान पहुंचाकर त्वचा की उम्र बढ़ा देती है।

ये त्वचा की खुद को सुधारने की क्षमता को खत्म कर देती है। लिहाजा आम मॉस्चेराइजर्स और तेल इन पर काम नहीं कर पाते और इससे त्वचा को ज्यादा नुकसान होता है।

सेल्फी जानलेवा साबित हो रही है तो उसके लिए सावधानी बरतना जरूरी है। पहला सिर्फ सेल्फी की आस में ऐसे ‘जानलेवा एवडेंचर’ से बचा जाए जहां जान का खतरा हो, किसी दुर्घटना का अंदेशा हो।

इसके लिए जरूरी है कि चलती ट्रेन, चलती गाड़ी ,पहाड़ों और छत पर सेल्फी खींचने से बचना चाहिए। ऐसी जगहों पर ज्यादातर ये देखा गया है कि ‘परफेक्ट’ सेल्फी पिक्चर के चक्कर में दुर्घटना हो जाती है जिसका हमें कतई अंदाजा नहीं होता।

सेल्फी का शौक या क्रेज बुरा नहीं कहा जा सकता लेकिन यह उस हद तक नहीं होना चाहिए जहां जिंदगी सुरक्षित नहीं रह जाती और मुश्किलों में घिर जाती है। समंदर की लहरों या पहाड़ की ऊंची चट्टानों के अलावा बागानों के फूल या फिर घर में कमरे के अंदर भी सेल्फी ली जा सकती है।

सेल्फी पर नियंत्रण बेहद जरुरी है क्योंकि इस बेहतरीन जिंदगी को बेहतरीन बनाने के लिए सेल्फी से ज्यादा महत्वपूर्ण हमारा जीवन है इसलिए ध्यान रहे की जब भी सेल्फी ले अपने इस अनमोल जीवन का भी ध्यान रहे।

 

प्रियंका द्विवेदी

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सावधान ! लव सेक्स और फिर गर्भ निरोधक दवाइयों का खेल – शालिनी सिंह

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RJ Shalini

मॉर्डन होती ज़िन्दगी में एक तरफ़ हेल्थ कॉन्शस होते हम और दूसरी तरफ खुद को जागरूक मानते हुए अपनी समझ से तो सही किंतु वास्तविक दृष्टिकोण में एकदम ग़लत और बचकाने फैसले से स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ हम कर रहे हैं और इसके ज़िम्मेदार कोई एक लोग नहीं पूरी एक व्यवस्था ही है।

आज हर कोई पेज थ्री का एक करेक्टर बनना चाहता है ,दिखना चाहता है किंतु भूल जाता है कि 3 घण्टे के शो में दिखा हर पहलू कट, कैमरा ,एक्शन,और फिर एडिटिंग से संवर कर निकला हुआ वो कैप्सूल होता है जो सिर्फ मनोरंजन का साधन होता है और कभी कभी तमाम सवाल, और जवाब छोड़ जाता है मानसपटल पर जिसके उत्तर की ख़ातिर उस तीन घण्टे के कैप्सूल को हम जीवंत करने लगते हैं ज़िन्दगी में।

जी हां दोस्तों हर युवा ने फिल्मों से ही तो जाना सीखा कि प्यार कैसे होता है , और फिल्मों से ही जाना लव, सेक्स और धोखा क्या है ? लेकिन फिल्मों से ये नहीं जान सका कि सुरक्षित सम्बन्ध के लिए रंग में भंग भी न पड़े और रिस्क भी न हो तो प्यार में कब और कौन सा कैप्सूल प्रेमिका को खिलाना है …… अफसोस भी है और आश्चर्य भी कि प्यार में बहकते भटकते क़दम जब लड़खड़ा जाते हैं तब उस गलती को सुधारने का खूबसूरत उपहार होती है अनवांटेड 72 …. जी हां अनवांटेड 72 की एक गोली असुरक्षित यौन सम्बन्धों के होने वाले परिणाम से बचाने में साथ निभाती है 72 घण्टों के भीतर उपयोग में ली जाए तो ।

unwanted 72

सोच के देखिए कि अगर ये गोली इतनी ताकतवर है कि वांटेड को अनवांटेड कर सकती है तो कितनी घातक होगी। लेकिन प्यार में अंधे युवाओं ने जब tv पर इसका एड देखा होगा तो यकीनन उनके प्यार के पंखों को आसमान मिल गया होगा।

लेकिन अफ़सोस कि न तो किसी एड में ये पता चला न ही किसी स्वास्थ्य केंद्र के सुरक्षित सम्बन्ध के उपायों पर जागरूकता अभियान में कि अनवांटेड 72 की गोली जीवन भर की खुशियों को अनवांटेड करने में प्रभावशाली है। एड कम्पनी या फिर मेडिसिन लांच करने वाली कम्पनी या किसी भी स्वास्थ्य केंद्र की गलती हो तब दोष भी दिया जाए ।

असल में प्यार में डूबे ,भटकते, बहकते युवाओं की गलती है कि वो प्रेमांधता में ख़ुद की सुरक्षित करने के लिए जिस अनवांटेड 72 का अंधाधुंध प्रयोग कर रहे हैं वो प्रेमिका हो या पत्नी किसी के लिए भी घातक है। ये गोली असुरक्षित यौन सम्बन्ध के लिए है ही नहीं उसके लिए तो ,सहेली ,माला डी, जैसी गोलियां है जो नियमित खानी पड़ती हैं या फिर , कंडोम ,कॉपर टी का उपयोग आम चलन में है जो हर अस्पताल में सरकारी सुविधाओं , अभियानों में लोगों के बीच जागरूकता के उद्देश्य से और सुरक्षित सम्बन्ध के साथ परिवार नियोजन हेतु अपनाने के लिए प्रसारित किए गए।

अनवांटेड 72 का कभी अस्पतालों में प्रचार नहीं किया गया क्योंकि ये गोली आपातकालीन गोली है उन अवस्थाओं के लिए जिसमें अधीरता में या जबरदस्ती या गलती से स्थापित सम्बन्ध के बाद गर्भ ठहरने के डर को समाप्त करने और स्त्री के जीवन की बड़ी मुश्किलों को सहज करने में उपयोग की जाती है ।

इसका अधिक उपयोग स्त्री को बांझ बनाने में सहयोगी है इस बात की जानकारी से कोसों दूर धड़ल्ले से प्रयोग करती लड़कियों ने इसे जादुई गोली समझकर अपना लिया और कैमिस्ट की दुकान में खुले आम उपलब्धता ने भी इस भ्रम को पुरजोर समर्थन दिया कि इसका उपयोग प्यार की राह की मुश्किलों को आसान करने के लिए ही है। आज गर्भधारण के लिए डॉक्टरों के क्लीनिक पर लाखों खर्च करने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है वो भी उन लोगों की जो पढ़े लिखे ,स्वास्थ्य के प्रति जागरूक और संभ्रांत हैं। एक बड़ी वजह आपके सामने लाने का प्रयास कर रही हूँ ।

इस बाबत जब मेरी डॉक्टर मित्रों से चर्चा होती है तो पता चलता है कि इन दवाओं की वजह होने वाले दुष्परिणाम को भोगती महिलाएं अक्सर आती हैं …..

जिनकी शिकायत होती है कि गोली खाई थी उसके बाद पीरियड तो आ गए लेकिन रक्तस्राव बन्द ही नहीं हो रहा ,या फिर अनियमित हो गया , वजन बढ़ने लगा आदि। हार्मोन्स पर असर डालती इन गोलियों के दुष्प्रभावों पर भी नज़र डालने की ज़रूरत है और केमिस्ट की दुकानों पर सहज उपलब्धता पर भी रोक लगाए जाने की ज़रूरत है ।

बाज़ार तो सोची समझी रणनीति के तहत फल फूल रहा है किंतु प्यार की असहजता को सहजता के रूप में परोसकर यही बाज़ार प्यार को कुछ दिन ,महीनों ,सालों का सुकून भले दे दे लेकिन उसके बाद जीवन की खुशियों पर ग्रहण बनकर छायेगा और फिर एक बार यही बाज़ार खुशियां देने के प्रलोभन लेकर कुछ और गोलियों ,तकनीकों,विकल्पों को रख देगा और हम सब जीवन भर बस सुरक्षित प्यार ,परिवार और खुशियों की ख़ातिर दर बदर अस्पतालों की सीढ़ियां चढ़ते रहेंगे और कोसेंगे कभी ख़ुद को कभी पीछे छूट चुके उस बहकते ,मचलते प्यार को ।

अनवांटेड को अनवांटेड ही रहने दें और थोड़ा सा सजग हों ख़ुद के प्रति ,प्यार के प्रति ,परिवार के प्रति और स्वास्थ्य के प्रति। फिर भी अगर कोई मुश्किल आ जाये तब केमिस्ट की दुकान नहीं डॉक्टर की सलाह लेकर अगला क़दम बढ़ाये। दोस्तों आज हम अगर खुलेआम प्यार करने को अपनी आज़ादी समझते हैं और अधिकार भी तो खुलेमन से गलतियों को भी स्वीकारें और चोरी से नहीं निसंकोच होकर डॉक्टरों की सलाह से ही निराकरण करें ।

आज़ादी और अधिकार की बात करने वाली युवा पीढ़ी जब खुलकर प्यार और सेक्स जैसी बातों के लिए आज़ादी की कानूनी लड़ाई लड़ने को तैयार दिखती है तो फिर इस लड़ाई में प्यार और सेक्स के साइडइफेक्ट और स्वास्थ्य के साथ होने वाले खिलवाड़ के प्रति भी सजगता को दिखाए ही नहीं जीवन में अपनाए तब होगी प्यार की जीत और तभी खुशियां होंगी वांटेड ,मुश्किलें अनवांटेड।

शालिनी सिंह एंकर- ऑल इंडिया रेडियो व स्वतंत्र लेखिका

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स्वच्छ भारत मिशन की धज्जियाँ उड़ाता कानपुर नगर निगम, गंदगी देख पीएम को भी आ जाएगी शर्म

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#स्वच्छ_भारत_अभियान
#देश के प्रधानमंत्री जी का सपना #स्वच्छ_भारत हो अपना
जब तक ये सोच नहीं होगी👇
#देश के हर नागरिक का हो सपना स्वच्छ भारत हो अपना

लगता है नगर निगम कानपुर (Kanpur Municipal Corporation) ने ठान लिया है हमें तो #प्रथम स्थान पर बने रहना है चाहे जो हो जाए ..😊

#मोदी जी भारत को स्वच्छ बनाने के लिए कितना प्रयास कर रहे हैं ये हम सभी देख रहे हैं उनके प्रयास सराहनीय भी है , पर क्या वास्तविकता में धरातल पर कोई कार्रवाई हो रही है , कोई सुधार हो रहा है?? आज कोचिंग से लौटते वक्त मात्र कुछ km के रास्ते में तीन प्रमुख स्थानों कि दशा देखी तब पता चला कि पिछले दिनों WHO कि जो रिपोर्ट पढ़ी थी वो तो बिल्कुल(💯 %) fit बैठ रही है अपने #कानपुर_महानगर पे

स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत करते प्रधानमंत्री मोदी 

ऐसे ही नहीं #कानपुर #WHO की रिपोर्ट में दुनिया में प्रदूषण में #प्रथम स्थान प्राप्त किया है बाकी आप फोटो में गन्दगी कि स्थिति देख ही सकते हैंऔर ये स्थिति तो तब है जब देश के #प्रधानमंत्री जी इस अभियान को एक युद्ध की भांति समझकर पूरे भरसक प्रयास से प्रशासन के साथ साथ अपनी राजनीतिक पार्टी (विश्व की सबसे ज्यादा कार्यकर्त्ता वाली पार्टी) के सभी पदाधिकारियों को इस अभियान में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेने को कह रहे हैं , उसके बावजूद स्थिति में कोई सुधार नहीं होना कोई आश्चर्य चकित होने की बात नहीं है( बस एक बार किसी स्वच्छता कार्यक्रम के कुछ समय पहले या कुछ समय बाद चले जाना जब #मीडिया जा चुकी हो)

ऐसा बिल्कुल नहीं है कि सरकारी अधिकारियों , कर्मचारियों में क्षमता नहीं है , शहर को स्वच्छ करने की
क्योंकि जब भी कोई कार्यक्रम होता है ,कोई बड़ा नेता आता है तो ये एक दिन के अन्दर अपने क्षेत्र को ऐसे चमका देते हैं पूछो मत , आखिर नेता जी को खुश जो करना है , System पर आरोप लगाने के साथ-साथ हम सभी को भी जागरूक होने की जरूरत है , कहीं न कहीं हम लोग भी इस गन्दगी के जिम्मेदार है ,

क्योंकि ये कूड़ा कहीं बाहर से नहीं आ रहा है न ही सफाई कर्मचारी , अधिकारी आकर फेंक रहा है , ये कूड़ा आखिर फेंक भी तो हम ही लोग रहे हैं , क्योंकि जब तक हमें कोई प्रत्यक्ष व्यक्तिगत नुकसान न हो तो हम लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता , पर आपको शायद ये अनुभूति भी नहीं है कि ये हमारी आने वाले समय के लिए slow poisson का कार्य कर रहा है ।।

यह भी पढ़े : देशद्रोह के आरोपी ‘कन्हैया कुमार’ को वोट देने का पाप कर पायेगी बेगूसराय की जनता?

इसीलिए हम सभी को इस अभियान को किसी एक राजनैतिक पार्टी से न जोड़कर देश की इस मुहिम को सफल बनाने के लिए SYSTEM के साथ साथ खुद को भी जोड़ना होगा , अपने आसपास गन्दगी फैलाने वाले लोगों को जागरूक करना होगा , सफाई कर्मचारी द्वारा सफाई न किये जाने पर उसकी शिकायत समय निकाल कर करनी होगी , आपके द्वारा चुने गये पार्षद को अपने वार्ड कि समस्या मुखर होकर बतानी होगी (ये भूलकर कि वो हमारे मिलने वाले हैं उनसे शिकायत क्या करें)

बाकी देश तो चल ही रहा है !!!

✍️✍️
अभिनव दीक्षित

 

नोट : इस लेख में लेखक के स्वयम के विचार हैं. बंधुत्व डॉट इन के संपादक या टीम का लेखक के विचारों से सहमत होना अनिवार्य नहीं है. अत: किसी भी वाद विवाद के लिए लेखक स्वयम जिम्मेदार होगा.

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